Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
भव्यः पश्यति शास्त्रार्थमेव पूर्वापरान्वितम् ।
न दृष्टिविषयं वस्तु यत्पश्यति करोति तत् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
शार ओर अशास्त्र के अनुसार सम्पादित हुई विद्वान ओर अविद्वान की क्रियाओं में भी
विलक्षणता दिखाई देती ही है, अतः जगत् की सत्ता भी भिन्न-भिन्न द्रष्ट के अनुसार ही व्यवस्थित
प्रतीत होती है. इस अभिप्राय से कहते हैं /
जो विवेकी पुरुष है वह पूर्वापर शास्त्र के अनुसार ही देखता और करता है । आँखों के सामने
पड़ी भी शास्त्रनिषिद्ध वस्तु को भोग्यरूप से नहीं देखता और न तो उसके लिए कुछ करता ही है