Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

नश्यत्येव च दृश्यश्रीः सैव नान्यैव नैव च । इत्थं भवेत्समुचितं कृतं शास्त्रं च नान्यथा ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

जग्रत्‌ और व्रह्म का अभेद स्वीकार करने से तो द्ृश्यप्रपंच का नाश होने पर ब्रह्म के नाश की भी शंका हो सकती है / यदि वह भेद आध्याम्तिक मान लिया जाय, तब तो प्रतियोगी की तरह उसके नाश का भी वस्तुतः व्रह्म के साथ सम्बन्ध न होने के कारण यह दोष नहीं आता और शास्त्र भी सफल हो जाते हैं; इसी आशय से कहते हैं / यह दृश्य की शोभा बार-बार नष्ट होती और उत्पन्न होती ही रहती है अतः यह कोई नहीं कह सकता कि यह वही है या दूसरी । इस तरह अनिर्वचनीय अविद्यामात्रसिद्ध यह दृश्य श्री नष्ट अवश्य ही होती है । ऐसी स्थिति में अविद्या के बाध द्वारा जगत्‌ का बाध होने पर शास्त्र सफल होते हैं, अन्यथा नहीं