Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verses 31–32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
किमप्येव तदत्यच्छं बुध्यते बोधपारगैः ।
शान्तसंसारविसरैः परां भूमिमुपागतैः ॥ ३१ ॥
प्रतिषिद्धा मयैते तु येऽर्थाः सर्वत्र ते स्थिताः ।
अस्मद्बुद्ध्या परिच्छेद्याः सौम्याम्भोधेरिवोर्मयः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
एवं (तद्यथात्विदो विदुः“ इस आगरम को भी उद्धृत करते हैं /
किन्तु बोधपारंगत, संसारविस्तार से शून्य तथा पंचम एवं षष्ठ भूमिकाओं को प्राप्त हो चुके
महानुभाव लोग इस अनिर्वचनीय अतिस्वच्छ आत्मा का स्वयं अनुभव करते हैं