Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
पदं यथैतत्सर्वात्म सर्वार्थपरिवर्जितम् ।
यथा तत्र च पश्यन्ति तत्रैकपरिणामिनः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
पत्थर में न खुदी गई नाना प्रकार की प्रतिमाओं की तरह योगियों को अपनी इच्छा के
अनुसार स्वस्वरूप में स्थित उप्र परमपद में अस्ति" और नास्ति' दोनों तरह से जयत् का
दर्शन होता हैं, यह कहते हैं /
योगी लोग अपनी इच्छानुसार सर्वात्मक वह परम पद जैसे समस्त अर्थो से युक्त है तथा
जैसे समस्त अर्थो से रहित है, वैसे उसे देखते हैं