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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verses 23–26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, verses 23–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 23-26

संस्कृत श्लोक

महाकल्पान्त उन्नष्टे सर्वस्मिन्दृश्यमण्डले । आमहादेवपर्यन्तं समनोबुद्धिकर्मणि ॥ २३ ॥ व्योमन्यपि शमं याते कालेऽप्यकलितस्थितौ । वायावपि त्वपगते तेजस्यत्यन्तमस्थिते ॥ २४ ॥ तेजस्यपि गते ध्वंसं वार्यादौ सुचिरं क्षते । अलमन्तमनुप्राप्ते सर्वशब्दार्थसंचये ॥ २५ ॥ शिष्यते शान्तबोधात्म सदच्छं बाध्यवर्जितम् । अनादिनिधनं सौम्यं किमप्यमलमव्ययम् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

एकमात्र यही कारण है कि महाकल्प के अन्त में समस्त भेदों का लय हो जाने पर लय को प्राप्त न हुआ अनुभवात्मा ही अवशेष रह जाता है, यह कहते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, महाकल्प के अन्त में महादेवपर्यन्त मन, बुद्धि और समस्त कर्मों के साथ जब यह सम्पूर्ण दृश्यमण्डल नष्ट हो जाता है, आकाश तथा अकलित स्थिति काल भी शान्त हो जाता है, वायु चली जाती है तथा तेज की स्थिति बिलकुल डाँवाडोल हो जाती है एवं तेज भी जब ध्वस्त हो जाता है, जल, पृथिवी आदि का भी दीर्घकाल के लिए नाश हो जाता है, जब कि सम्पूर्ण शब्दार्थं समूह बिलकुल अन्तदशा को प्राप्त हो जाता है, तब आदि और अन्त से रहित सौम्य, अविनाशी, बाध्यशून्य, वाणी का अविषय, स्वच्छ सन्मात्र, केवल निर्मल शान्त बोधस्वरूप कोई अनिर्वचनीय आत्मा ही शेष रह जाता है