Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 37
छत्तीसवाँ सर्ग समाप्त सेंतीसवाँ सर्ग भोगों की इच्छा जिससे उत्पन्न ही न हो या उत्पन्न होने पर वह केवल ब्रह्मरूप ही समझी जाय, उस ज्ञानयोग का युक्तियँ से वर्णन।
79 verse-groups
- Verses 1–2महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, इच्छारूपी विष का विकार दूर करनेवाले स्पष्टरूप से प…
- Verse 3हे श्रीरामजी, यदि आत्मा से भिन्न कोई पदार्थ यहाँ हो, तो आप उसकी बेरोक- टोक इच्छा कीजिये (…
- Verse 4वह चिति आकाशरूप हे । आकाश ही आकाशरूप विषय और उसका ज्ञाता है । यह जगत् का आभास भी आकाशरूप…
- Verse 5ज्ञान से विषयों के गृहीत न होने पर इच्छा का उदय न होने के कारण, ग्राह्म और ग्राहक के सम्ब…
- Verse 6ग्राहक सम्बन्ध को स्वनिष्ठ (आत्मनिष्ठ) भी मान लिया जाय, तो भी वह उपलब्ध नहीं होता, क्योकि…
- Verse 7तात्त्विक आत्मा में जो अविश्रान्ति है यानी आत्मा में परायण न होना है, बस यही एकमात्र ग्रा…
- Verse 8और तत्त्वज्ञान का भी यही स्वभाव है कि असत्यरूप अहन्ता आदि अपना तत्त्व जानकर उस आत्मा में…
- Verse 9द्श्यादि ओर निवाण - इन दोनों का परस्पर अस्रहभाव भी स्वभावतः ही ह यह कहते हैं / निर्वाण मे…
- Verse 10क्यो सह्ानुभव भी नहीं है 2 इस पर कहते हैं / यदि ये दोनों साथ होते, तो परस्पर द्वारा बाधित…
- Verse 11तब तो स्र्वजनप्रप्निद्ध द्श्यावि महाकोतुक निकाणि में दुर्लभ ही होगा, इसका एरिहार करते हुए…
- Verse 12शुक्तिका में चाँदी के समान, विचारकर देखने से जो कुछ उपलब्ध नहीं होता, वह पुरुषार्थ का सम्…
- Verse 13दृश्य के सद्भाव में महादुःख है और असद्भाव में महान् सुख है । निदिध्यासन से मननसहित अभाव…
- Verse 14अब परम कारुणिक भगवान् कर्तिष्ठकी दृश्य कोंदुक मे आसक्त अधम अधिकारियों की, जो श्रोता हैं;…
- Verse 15जब कार्यकारणभावादि सब ब्रह्म ही है, तभी तो देहादिपरिच्छिन्न पदार्थों के बाध से विस्तार को…
- Verse 16अतएव आकाशस्वरूप सर्वात्मक परिपूर्ण ब्रह्म में कार्य-कारण आदि दृश्य सत्ता को स्वीकार कर जो…
- Verse 17तथा कार्यकारण से परिपूर्ण उक्तियों मेँ ही सर्वस्वभावस्वरूप अविद्या के सिवा और दूसरा क्या…
- Verse 18यही कारण है कि विद्वान् महानुभावों को, आगे चलकर उसका बाध हो जाने से, ष्टि आदि के हेदु के…
- Verse 19न तो दुःख है और न सुख है, किन्तु शान्त शिवमय यह जगत् है। जब चिन्मात्रता से भिन्न कुछ है…
- Verse 20जैसे मिट्टी की देहवाली योद्धाओं की सेना में एकमात्र मिट्टी से अन्य कुछ नहीं है वैसे ही सद…
- Verse 21यदि सव कुछ ब्ह्ल ही है, तो फिर उसकी इच्छा भी तो ब्रह्म ही ठहरी, उसकी उत्पत्ति मानने में क…
- Verse 22इच्छानुत्यादने यत्नः कियताम् कि कुथा भमः ^ (इच्छा उत्पन्न न हो, इसी में यत्न कीजिये, व्य…
- Verse 23जब-जब आत्मतत्त्वज्ञान उदित होता है तब-तब सांसारिक विषयोपभोग की इच्छा शान्त हो जाती है
- Verse 24क्योकि यही वस्तु का स्वभाव है। सूर्य के उदित होने पर जैसे रात बिलकुल शान्त हो जाती है, उद…
- Verse 25जैसे-जैसे ज्ञान का उदय होता है, वैसे-वैसे द्वैत की शान्ति ओर वासना का विलय होता है, तब भल…
- Verse 26मूल का उच्छेद होने से भी तत्ववेत्ताओं की इच्छा के उदय का संभव नहीं है, इस आशिग्राय से कहत…
- Verse 27उस पुरुष को न तो इन दृश्य पदार्थो में वैराग्य उत्पन्न होता है ओर न उसको राग ही उदित होता…
- Verse 28काकतालीय योग से यानी आकस्मिक घटना से या अन्य किसी की प्रेरणा से यदि कदाचित् कुछ इच्छा कर…
- Verse 29ऐसी परिस्थिति में उस आत्मतत्त्वदर्शी की वह इच्छा या अनिच्छा दोनों ब्रह्मस्वरूप ही है, इसम…
- Verse 30भद्र, यदि किसी जीव को तत्त्वज्ञान प्राप्त हो गया, तो उसकी इच्छा तत्काल ही निवृत्त हो जाती…
- Verse 31इसीलिए रागप्राप्त विधिनिषेध शास्त्रों में वह इच्छाशून्य तत्त्वज्ञानी अधिकृत नहीं होता, यह…
- Verse 32बाह्य इच्छा की निवृत्ति और स्वात्मानन्दानुभव में तृप्ति ये दोनों आत्मज्ञान की प्राप्ति के…
- Verse 33जब सारा प्रपंच नीरस हो जाता है तब कहीं पर भी तत्त्वदर्शी स्वाद नहीं लेता, तब इच्छा भी बढ़…
- Verse 34तत्त्वज्ञान से एकता और अनेकता के झगड़े को छोड़कर जो पुरुष चुपचाप स्थित हो जाता है उस पुरु…
- Verses 35–36तत्त्वज्ञान से जिसकी द्वैतबुद्धि नष्ट हो गई है एवं द्वैतनाशरूप वस्तु तथा एकत्वसंख्या से र…
- Verse 37न तो इच्छा से, न अनिच्छा से, न सद्वस्तु से, न असद्रस्तु से, न अपने से, न दूसरे से और न इन…
- Verse 38अपना मुक्तस्वरूप जाननेवाले तत्त्वदर्शी को कभी इच्छा ही उत्पन्न नहीं होती । यदि उत्पन्न हो…
- Verse 39न दुःख है और न सुख ही है, किन्तु यह सारा जगत् अज, आनन्दस्वरूप, शान्त परब्रह्म ही है, इस…
- Verse 40भद्र, पूर्ववर्णित आत्मतत्त्व का निश्चय कर दुःख को निरतिशयानन्दरूप आत्मा की भावना से, विष…
- Verse 41तत्वबोध के अनुसार जो स्थिति हें कही समस्त वस्तुओं की अश्रान्त स्थिति है, ऐसी स्थिति अन्ना…
- Verse 42उक्त रीति से जगत् नहीं है, इस भावना से जब व्यापक विषयशून्य संविद्-रूप आकाश स्थित हो जात…
- Verse 43भद्र, जो यह कुछ स्थावर-जंगमात्मक जगत् दिखाई दे रहा है शान्त आकाशात्मक ब्रह्मरूप ही है और…
- Verse 44अन्य पुरुष के मनोराज्य के कल्पित नगर में तुम्हें भीतर जाने-आने में जैसे किसी प्रकार की रु…
- Verse 45चूँकि समुद्र, आकाश, पृथिवी, नदी, पर्वत आदि से शून्य आत्मा में दरष्टा का अन्तःकरण ही समुद्…
- Verse 46जो कुछ यह दिखाई दे रहा है वह स्वप्न में बने हुए नगर के सदृश एवं बालक द्वारा कल्पित उन्नत…
- Verse 47श्रान्तिगरस्त पुरुष स्वयं मिथ्या हैं, इससे भी श्रन्ति में मिथ्यात्व है, यह कहते हैं / चूँ…
- Verse 48यह जो जगत् है, वह न सत् है और न असत् तथा न तो सत्-असत् उभयरूप है, इसका तत्त्व भी किस…
- Verse 49हे श्रीरामभद्र, यद्यपि तत्वबोध के बल से ही भलीभोति शान्त हो रहे विषयों की इच्छा या अनिच्छ…
- Verse 50भद्र, आकाश में आकाश की नाई अविकृत चिदाकाश में ही “आकाशाद् वायुः" (आकाश से वायु) इत्यादि…
- Verse 51इन सव बातो से निष्कर्ष यह निकला कि चिति की बहियुखिता ही इच्छा, चित्त और ससार हैं तथा अन्त…
- Verse 52ङ स्थिति में सृष्टि या प्रलय दोनों अवस्थाओं में जसे ईश्वर को कोई हानि या लाभ नहीं होता, क…
- Verse 53उसमें युक्ति बतलाते हैं । इच्छा-अनिच्छा, सत्-असत्, भाव-अभाव तथा सुख-दुःख ये सब कल्पनाएँ…
- Verse 54भद्र, जिस महामति को दिन-पर-दिन समस्त इच्छाओं की कमी होती जाती है, विवेक-शम से सन्तुष्ट उस…
- Verse 55इच्छारूपी छुरी से विद्ध हुए हृदय में ऐसी वेदना उत्पन्न होती है कि जिसके लिए ये प्रसिद्ध म…
- Verse 56ब्रह्माजी ने प्राणियों के दुःखों की चिकित्सा करने के लिए जिन ओषध, मन्त्र, यन्त्र आदि कार्…
- Verse 57यदि शंका हो कि श्रमचिद्ध किसी उपाय से ही श्रम की चिकित्सा करेंगे, तो इस पर कहते है/ यदि य…
- Verse 58श्रान्तिभिद्ध वस्तु असल में असत् होने के कारण पारगार्थिक दुःखनिवारण में सामर्थ्या नहीं र…
- Verse 59अमूर्त मन की श्रान्तिमात्र यह जगत् मूर्त देहादिभाव को कैसे प्राप्त हो जाता है, इस पर कहत…
- Verse 60जड़ देहरूप होने पर भी वस्तुतः चितिशक्ति अक्षत ही रहती है, विनष्ट नहीं होती, यही कारण है क…
- Verse 61प्रातिभासिक जड़ता का अस्तित्व ग्रतिभास़ के अधीन है, इसलिए ग्रातिभाम्रिक जड़ता अनिर्वचनीय…
- Verse 62यही कारण है कि जगत् ओर बल्यस्तत्ता के एकरूप होने से इन दोनों में कोड भेद नहीं हैं, यह कह…
- Verses 63–64स्वप्नादिक पदार्थों की नाई प्रतिभास से अतिरिक्त ग्रातिभाम्रिक पदार्थों की उत्पत्ति आदि कह…
- Verse 65इसलिए इसके त्याग और ग्रहण में मनुष्य को अभिनिवेश रखना युक्त नहीं है, यह कहते हैं। चिदाकाश…
- Verse 66इसी प्रकार बुद्धि आदि में अपने प्रतिभासक चैतन्यात्मा की अपेक्षा से भेद और अभेद का संभव न…
- Verse 67इस चिति में कल्प, महाकल्प एवं उनमें होनेवाली सब क्रियाएँ अहेतुक तथा अक्रमिक हैं और वे ऐसे…
- Verse 68इसका फलितार्थ यह हुआ कि सव चिदाकाश ही है, यह कहते हैं । चूँकि चिति को सृष्टि का संवेदन अप…
- Verse 69चिदाकाशरूप दीवार में जगद्रूपी महान् चित्र चितिरूपी रंग से ही व्याप्त है। न तो यह चित्र उ…
- Verse 70जगद्रूषी महातरंगों से युक्त द्रवशील चितिरूपी जल में कौन-सा पदार्थं कैसे उत्पन्न हुआ या कौ…
- Verse 71तब तो जयत्- रूप से विति के ही उदय ओर अस्त होते रहें; हानि क्या है, इस पर नहीं ऐसा कहते ह…
- Verse 72परन्तु यि मायाविलास़ द्रष्टि से देखते हैं; तो फिर सी पदार्थों में सर्वकृपता की यथेच्छ उपप…
- Verse 73संविद्रूप सिद्धौषधचूर्ण के प्रयोग से तो योगीजन आधे निमेष में जगत् को आकाशरूप और आकाश को…
- Verses 74–76जैसे इस प्रसिद्ध आकाश में असंख्य सिद्ध संकल्पो से कल्पित नगर परस्पर असंलग्न एवं अन्तर्हित…
- Verse 77इसमें दृष्टान्त बतलाते है / जैसे महासमुद्र में अनेक आवर्त परस्पर मिले हुए भी पृथक्-से अव…
- Verse 78इस तरह सम्पूर्ण प्राणियों एवं उनके भोग्य सृष्टियों की विवर्तरुप स्थिति शाश्वत ब्रह्म में…
- Verse 79परमार्थ चिदाकाश के अपने आमोदरूप स्वाभाविक ये सृष्टि के विभ्रम हैं। ये स्फटिकमणि के भीतर द…
- Verse 80पुष्पों की गन्ध और सिद्धों की भूमि जैसे परस्पर मिली हुई रहने पर भी मिली हुई नहीं रहती, वै…
- Verse 81यही कारण हैँ कि स्थूल संकल्प और मोहवाले पामरजनों की द्वाष्टि से इस प्रफव की स्थूल अनुभव क…
- Verse 82की बाह्यअनर्थवादिता (८) ही सत्य है, किन्तु आप लोगों के संकल्प के अनुसार ये सभी ज्ञान फलीभ…
- Verse 83तब इनमें कौन-सा पक्ष प्रामाणिक है, उसको बतलाते हैं / वस्तुतः चिति में जो चित्त्व है यानी…
- Verse 84कहे हुए का अनुवाद कर ग्रकृत में उसकी योजना करते हुए उपसंह्यर करते हैं / हे श्रीरामचन्द्रज…