Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, verse 61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
व्योम्न्यसत्यमवस्तुत्वात्सत्यं चानुभवाद्यथा ।
नीलत्वं तद्वदीशेऽस्मिन्सर्गो नासन्न सन्मयः ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रातिभासिक जड़ता का अस्तित्व ग्रतिभास़ के अधीन है, इसलिए ग्रातिभाम्रिक जड़ता
अनिर्वचनीय है, यह कहते हैं ।
जैसे आकाश में नीलत्व अवस्तुरूप होने से असत् है, प्रतिभास के कारण सत्य-सा भासता है,
परन्तु वस्तुतः सत्य ही नहीं है वैसे ही इस परमात्मा में यह सृष्टि सत्य-सी भासती है, वस्तुतः वह
न तो सत्य है और न असत्य ही है, किन्तु अनिर्वचनीय है