Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verses 74–76
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, verses 74–76 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 74
संस्कृत श्लोक
सिद्धसंकल्पनगराण्यसंख्यानि यथाम्बरे ।
तथा सर्गसहस्राणि सन्ति तानि तु चिन्नभः ॥ ७४ ॥
महार्णवे यथावर्ता अन्योन्यमपि मिश्रिताः ।
पृथगेवावतिष्ठन्ते पयसोऽन्ये च नैव ते ॥ ७५ ॥
महाचिति महासर्गा अन्योन्यमपि मिश्रिताः ।
पृथगेवावतिष्ठन्ते व्यतिरिक्ता न ते ततः ॥ ७६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे इस प्रसिद्ध आकाश में असंख्य
सिद्ध संकल्पो से कल्पित नगर परस्पर असंलग्न एवं अन्तर्हित हैं, वैसे ही चिदाकाश में (ब्रह्म में)
हजारों वे सृष्टियाँ हे