Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
परचिन्तापुरोमध्ये गतविघ्नं गमागमौ ।
यथान्तस्तव शून्यत्वात्तथैवास्मिञ्जगद्भ्रमे ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्य पुरुष के मनोराज्य के कल्पित नगर में तुम्हें भीतर जाने-आने में जैसे किसी
प्रकार की रुकावट नहीं होती, वैसे ही इस जगद्रूप भ्रम में किसी प्रकार की रुकावट तत्त्वज्ञ को नहीं
होती