Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 77
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, verse 77 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 77
संस्कृत श्लोक
सर्गात्सर्गान्तरालोके या प्रबुद्धस्य योगिनः ।
सिद्धलोकान्तरे प्राप्तिः सैवेति विबुधोक्तयः ॥ ७७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसमें दृष्टान्त बतलाते है /
जैसे महासमुद्र में अनेक आवर्त परस्पर मिले हुए भी पृथक्-से अवस्थित हैं, वास्तव में
वे जल से अतिरिक्त नहीं हैं, वैसे ही महाचिति में असंख्य बड़ी-बड़ी सृष्टियाँ यानी ब्रह्माण्ड
परस्पर मिले हुए भी पृथक्-से अवस्थित हैं । पर वास्तव में वे उससे अलग नहीं हैं ॥७५.७६॥
परस्पर छिपे हुए सिद्धों के भिन्न-भिन्न लोकों के अवलोकन के लिए इच्छा से प्रबुद्ध योगी की
पहले अपनी उपाधि का मूल चेतन में प्रविलापनकर फिर दूसरे के चित्त में प्रवेश कर उसके
लोक में जो अनुप्रवेशरूप प्राप्ति है, वही एक सृष्टि से दूसरी सृष्टि के अवलोकन के लिए भी
है, यह विद्वान् लोग (५४) बतलाते हैं