Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verses 35–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 35,36
संस्कृत श्लोक
बोधादस्तमितद्वैतमद्वैतैक्यविवर्जितम् ।
यः स्वच्छो विगतव्यग्रः शान्त आत्मन्यवस्थितः ॥ ३५ ॥
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञान से जिसकी द्वैतबुद्धि नष्ट हो गई है एवं द्वैतनाशरूप वस्तु तथा एकत्वसंख्या
से रहित होकर जो पुरुष स्वच्छ, व्यग्रतारहित और शान्त होकर अपने स्वरूप में स्थित रहता है
उस पुरुष को यहाँ न तो किसी कर्तव्य से प्रयोजन है और न अकर्तव्य से ही प्रयोजन है एवं न तो
सब भूतों में किसी प्रयोजन की प्राप्ति ही है