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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

सा तु ब्रह्मैव कोऽर्थः स्यादस्या विधिनिषेधने । श्रीवसिष्ठ उवाच । ज्ञातायां संप्रबुद्धायामिच्छा ब्रह्मैव नेतरत् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

इच्छानुत्यादने यत्नः कियताम्‌ कि कुथा भमः ^ (इच्छा उत्पन्न न हो, इसी में यत्न कीजिये, व्यर्थ श्रगों स्रे कौन-सा मतलब है), इतत पूर्वोक्‍्त यत्न मे विधि ओर निषेध का निवारण रहते हुए भी सचमुच तत्त्ववेत्ताओं की इच्छा का उदय होने पर भी कोर हानि नहीं हैं। परन्तु विद्या से बाधित उस इच्छा का उदय होना ही दुर्लभ हैं, यह कहते हैं । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, आत्मतत्त्व का ज्ञान हो जाने पर संप्रबुद्ध हो जाने पर इच्छा ब्रह्मस्वरूप ही ठहरी है, ब्रह्म से अन्य नहीं । जैसा आपने समझा है, वह सब बिलकुल सत्य है, किन्तु फिर भी आप यह सुन लीजिये कि