Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 84
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, verse 84 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 84
संस्कृत श्लोक
कालो जगन्ति भुवनान्यहमक्षवर्गस्त्वं तानि तत्र च तथेति च सर्वमेकम् ।
चिद्व्योम शान्तमजमव्ययमीश्वरात्म रागादयः खलु न केचन संभवन्ति ॥ ८४ ॥
हिन्दी अर्थ
कहे हुए का अनुवाद कर ग्रकृत में उसकी योजना करते हुए उपसंह्यर करते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, सर्वाधारकाल, उसके अन्तर्गत ब्रह्माण्ड, उसके अन्तर्गत चौदह भुवन, उन
भुवनो के अन्तर्गत अहम् तथा त्वम् आदि भोक्ता, भोक्ताओं के भोगों के उपकरणभूत इन्द्रियसमूह,
शब्द, स्पर्शं आदि भोग्य विषय और उनमें विचित्र भोग यह सब कुछ ईश्वरात्मक यानी मायिक
सर्वज्ञता, सर्वशक्ति आदि से सम्पन्न ओर परमार्थतः शान्त, एक, अज, अविनाशी चिदाकाशरूप
ही है । ऐसा निश्चय होने पर राग आदि किसी का भी सम्भव नहीं हे