Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 81
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, verse 81 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 81
संस्कृत श्लोक
संकल्पाकाशरूपत्वात्सर्वानुभववत्स्थितेः ।
तनुसंकल्पमोहानां सत्याश्च मननोक्तयः ॥ ८१ ॥
हिन्दी अर्थ
यही कारण हैँ कि स्थूल संकल्प और मोहवाले पामरजनों की द्वाष्टि से इस प्रफव की स्थूल
अनुभव के समान स्थिति है तथा सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम स्रकल्प एवं मोहकाले योगियों की
द्रष्टि से सूक्ष्मादिभाव से इस प्रणव की स्थिति है / ऐसी स्थिति में सबको अनुभव एक-स्रा न होने
के कारण अपने-अपने अनुभव के अनुसार सबकी उक्तियाँ सत्य ही हैं; यह कहते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रपंच की स्थिति संकल्पाकाशरूप होने से जिसका जैसा अनुभव है
वैसी ही है । इसलिए सूक्ष्म संकल्प एवं मोहवाले योगियों की मननपूर्वक जगत् के विषय में जो कुछ
उक्ति हैं, वे बिलकुल सत्य हैं