Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
एतदेव ज्ञताचिह्नं यदिच्छास्वतितानवम् ।
ह्लादनं सर्वलोकानामथानुभव एव वा ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
बाह्य इच्छा की निवृत्ति और स्वात्मानन्दानुभव में तृप्ति ये दोनों आत्मज्ञान की प्राप्ति के चिह्न
हैं; यह कहते हैं ।
सब इच्छाओं का सर्वथा निरास होना और सब लोगों को अभयदान द्वारा प्रसन्न रखना एवं
अपने आत्मानन्दानुभव में स्थित रहना तत्त्वज्ञान का चिह्न है