Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 71
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, verse 71 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 71
संस्कृत श्लोक
शान्ते महाचिदाकाशे जगच्छून्यत्वशालिनि ।
चेत्यासंभवतः सन्ति नोदयास्तमयौ कुतः ॥ ७१ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो जयत्- रूप से विति के ही उदय ओर अस्त होते रहें; हानि क्या है, इस पर नहीं ऐसा
कहते हैं ।
जब विषयों का सर्वथा असंभव होने से जगत् ही नहीं है, तो फिर जगत् की शून्यता से शोभित,
शान्त, महाचिदाकाश में जगद्रूप से चिति के उदय और अस्त ही कैसे सिद्ध हो सकते हैं ?