Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
एषैव ग्राहकादीनां सत्ता यन्नात्मनिष्ठता ।
स्वभावावेक्षया सत्या न जाने क्व प्रयान्ति ते ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
तात्त्विक आत्मा में जो अविश्रान्ति है यानी आत्मा में परायण न होना है, बस यही एकमात्र ग्राह्म-
ग्राहक आदि त्रिपुटियों की सत्ता है । अशास्त्रीय दृष्टि की अपेक्षा से वे ग्राह्य-ग्राहक अदि सत्य होते
हुए भी शास्त्रीय तत्त्वदृष्टि का उदय होने पर न जाने कहाँ चले जाते है