Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
इच्छा भवत्वनिच्छा वा सर्गो वा प्रलयोऽथवा ।
क्षतिर्न कस्यचित्काचिन्न च किंचिदिहास्ति हि ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
ङ स्थिति में सृष्टि या प्रलय दोनों अवस्थाओं में जसे ईश्वर को कोई हानि या लाभ नहीं
होता, कैसे उच्छा या अनिच्छा दोनों अवस्थाओं में तत्वज्ञ को कड हानि या लाभ नहीं होता, यह
कहते हैं ।
श्रीरामजी, इच्छा हो या अनिच्छा हो, सृष्टि हो या प्रलय हो, इससे यहाँ किसीकी कुछ भी न
क्षति है या न कुछ फल है