Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 65
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, verse 65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
न देहः प्रतिभातोऽस्ति पृथ्व्यादिकारणान्वितः ।
केवलं ब्रह्मचिन्मात्रमेवात्मन्येव संस्थितम् ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए इसके त्याग और ग्रहण में मनुष्य को अभिनिवेश रखना युक्त नहीं है, यह कहते हैं।
चिदाकाश में पृथिवी आदि के अविद्यमान रहते तथा सृष्टि के एकमात्र प्रतिभासस्वरूप सिद्ध
होने पर मनुष्य को उसके त्याग ओर ग्रहण में भला कौन-सा आग्रह ?।६४॥
देह के लिए तो प्रथिवी आदि का त्याग और ग्रहण हो सकता हैं, परन्तु जब वे ही दोनों
(पएध्व्यादि ओर देह) एकमात्र ग्रतिभाग्स्वरुप होने से अस़त् हैं; तब तो वे त्याग और ग्रहण भी
असत् ही ठहरे, इस आशय से कहते हैं
पृथिवी आदि कारण सहित यह देह भी एकमात्र प्रतिभासस्वरूप होने से है ही नहीं, केवल
चिन्मात्र ब्रह्म ही अपनी आत्मा में स्थित है