Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इच्छाविषविकारस्य वियोगं योगनामकम् ।
शान्तये श्रृणु भूयोऽपि पूर्वमुक्तमपि स्फुटम् ॥ १ ॥
आत्मनो व्यतिरिक्तं चेद्विद्यते तदिहेच्छया ।
इष्यतामसति त्वेतत्स्वात्मान्यत्वं किमिष्यते ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, इच्छारूपी विष का विकार दूर करनेवाले स्पष्टरूप
से पहले वर्णित हुए भी योगनामक उपाय को इच्छामूलक सम्पूर्ण अनर्थो की शान्ति के लिए आप
फिर सुनिये
सर्ग सन्दर्भ
छत्तीसवाँ सर्ग समाप्त सेंतीसवाँ सर्ग भोगों की इच्छा जिससे उत्पन्न ही न हो या उत्पन्न होने पर वह केवल ब्रह्मरूप ही समझी जाय, उस ज्ञानयोग का युक्तियँ से वर्णन।