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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 29

अट्ठाईसवाँ सर्ग समाप्त उनतीसवों सर्ग व्यवहारकाल में जो भी कुछ कर्तव्य आ जाय उसे निभाते हुए अपने स्वरूप में सदा स्थिर रहना चाहिए, यों रामजी के प्रति महाराज वसिष्ठजी का उपदेश ।

77 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्री रामभद्र, शत्रु, मित्र आदि सबके लिए प्रारब्ध से जो कुछ कार्य…
  2. Verse 2भद्र, आकाश के सदुश विशद हो जाइए । प्राज्ञ बनिए । एक चिन्मात्र में अपनी दृढ स्थिति (निष्ठा…
  3. Verses 3–4रामजी, प्रारब्धवश प्राप्त हुए छोटे-बड़े शोक, आपत्ति, घोर संकट, अवट (गर्त) आदि सभी प्रसंगो…
  4. Verse 5सशय से जिस अर्थ को कहा, उसी को विस्तारपूर्वक कहते हैं / कमनीय (रमणीय) विषयों की प्राप्ति…
  5. Verse 6वासनाओं से आक्रान्त मूढ पुरुषों के सदृश अधार्मिक प्राणियों को मृत्यु के हेतु संग्राम आदि…
  6. Verse 7प्रारब्ध कर्मो के अनुसार प्राप्त हुए धर्मअविरोधी धन आदि के उपार्जन आदि कार्यों का बगुले क…
  7. Verse 8हे शत्रुनाशक श्रीरामजी, वासनायुक्त मूढ़जन के सदृश आप बलपूर्वक समस्त शत्रुओं का ऐसे विनाश…
  8. Verse 9वासना से आक्रान्त कर्मकुशल मनुष्यों के सदृश करुणापात्र जनों मे उदारता का और महात्माओं के…
  9. Verse 10हर्ष करने योग्य स्थानों में हर्षित होइए, दुःख करनेयोग्य स्थानों में दुःखी बनिये, दीनों पर…
  10. Verse 11कुछ करने पर म्रूढ़जनों को तो दोष लगता है, परन्तु जानी पुरुष को कुछ करने पर दोष नहीं लगता,…
  11. Verse 12हुए आपके ऊपर यदि इन्द्र की भी वज्रधारा गिर जाय, तो भी वह व्यर्थ हो जायेगी
  12. Verse 13समस्त संकल्प-विकल्पों से निर्मुक्त अपनी संविन्मात्ररूप अन्तरात्मा में, स्वेच्छा से जो स्थ…
  13. Verse 14ऐसे पुरुष को शत्र छेदते नहीं, अग्नि जलाती नहीं, जल भिगाते नहीं ओर पवन सुखाता नहीं
  14. Verse 15जिसमें चित्त भलीभाँति प्रकाशित होता है, ऐसे नित्य निरतिशयानन्दरूप, जन्मशून्य, जरा-मरणरहित…
  15. Verse 16हे रामभद्र, जगद्रूषी वृक्ष के पदार्थरूपी पुष्पों की सुगन्धशोभा के सदुश सारभूत स्वस्थ ब्रह…
  16. Verse 17अन्तर्मुखता से निरन्तर बाहर के कार्यो का सम्पादन कर रहे भी प्राणियों मे वासना ऐसे उत्पन्न…
  17. Verse 18भद्र, कछुए के अंगों के सदृश भीतर और बाहर के सब वृत्तियों से विरत होकर सारे कर्म करते हुए…
  18. Verse 19अन्दर की सुख -दुःखादिवृत्ति से शून्य, बाहर की घटादिवृत्ति से युक्त-से तथा प्रायः आधे जगे…
  19. Verse 20जैसे बालक एवं मूक आदि का विज्ञान अंदर की वासना से रहित होता है, वैसे ही अन्दर की वासना से…
  20. Verse 21भद्र, आप समस्त चिन्ताओं को तिलांजलि देकर ऐसे चित्त से युक्त रहिए, जो कि निर्विकल्प समाधि…
  21. Verse 22हे निष्पाप रामजी, ज्ञान से चित्त का विनाश हो जाने पर बची हुई संकल्परूपी कलंक से निर्मुक्त…
  22. Verse 23जागते हुए, व्यवहार करते हुए या जाते हुए भी आप सोये हुए पुरुष के सदृश वृत्ति के कारण न तो…
  23. Verse 24जाग्रत की अवस्था में भी यदि आप सब प्रकार की उपाधियों का विलयकर सुषुप्ति अवस्थावाले हो जात…
  24. Verse 25इस तरह धीरे-धीरे अभ्यास के द्वारा आप आदि-अन्त से रहित एेसा पद प्राप्त कीजिए, जो समस्त शीत…
  25. Verse 26न तो द्वैतात्मक जगत्‌ है ओर न एकात्मक ही जगत्‌ है, इस तरह के निश्चय से युक्त होकर आप आकाश…
  26. Verse 27समस्त द्वैत का अयलाय हो जाने पर तो आपका भी अहंकार /वस्तिष्ठजी का अहंभाव) रहेगा नहीं; डस स…
  27. Verse 28वसप्निष्ठजी को तो अहम्भाव आदि हैं ही नहीं; परन्तु हमारी और श्रोताओं की अज्ञान- द्वष्टि के…
  28. Verse 29महाराज वसिष्ठजी तो मौन धारणकर स्थित रहे ओर इधर सभ्य महाजन अब क्या होगा, इस संशय-सागर में…
  29. Verse 30अक गुरुजी के पास उत्तर देने की युक्ति रही ही नहीं; यों मान रहे श्रीरामभद्र कहते हैं / भगव…
  30. Verse 31महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे अनघ, मुझमें कहने की शक्ति नहीं है, इसलिए उत्तर-युक्ति न रही,…
  31. Verse 32प्रश्न की चरम सीमा बतलाने के लिए भूमिका बाँधते है / भद्र, प्रश्नकर्ता दो तरह के होते हैं…
  32. Verse 33हे महामते, इतने समय तक तो आप तत्पद को [ब्रह्मात्मा को) जानते ही नहीं थे, इसलिए आप सविकल्प…
  33. Verse 34अब तो आप तत्त्वज्ञ बन गये और परम पद में स्थिति भी आपने प्राप्त कर ली, इसलिए स्पष्ट है कि…
  34. Verses 35–36हे वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, यह जितना वाणीरूप भाषण है, वह चाहे सूक्ष्म अर्थवाल…
  35. Verse 37हे मनोरम, जो तत्त्वज्ञानी पुरुष है, उसके लिए कलंकपूर्णं उत्तर होता नहीं, क्योकि जितनी वाण…
  36. Verse 38हे भद्र, ज्ञानी शिष्य के सम्मुख मुझे जो यथावत्‌ सत्य है, उसे ही कहना चाहिए, परन्तु समस्त…
  37. Verse 39भद्र, जो परमपद है, वह तत्त्वज्ञान के पूर्व अज्ञान से उपदेशवाणी के योग्य है, वह कल्पनाकर स…
  38. Verse 40हे प्रिय, वक्ता पुरुष जिस रूप का होता है, उसी रूप का कथन करता है, मैं तो तत्त्वसाक्षात्का…
  39. Verse 41जो वाणी से अतीत पद में बैठा है, वह वाणीरूप मल को कैसे ग्रहण करेगा ? इसलिए मैं अवाच्य (कहन…
  40. Verse 42श्री रामजी ने कहा : भगवन्‌, वाणी में जो-जो भिन्नता, विरोधिता आदि से होनेवाले दोष प्रवृत्त…
  41. Verse 43महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे राघव, हे तत्त्वज्ञ मे श्रेष्ठ, जब आप भागत्यागलक्षणा से कुछ कह…
  42. Verse 44हे तात, जो “अहम्‌” यह वस्तु है, वह यह निरामय (विकारशून्य चैतन्याकाश) ही है । वह बाह्य एवं…
  43. Verse 45मेँ स्वच्छ चिदाकाशरूप हूँ, आप चिदाकाशरूप हैं ओर सम्पूर्णं यह जगत्‌ भी आकाशरूप ही है, अधिक…
  44. Verse 46विशुद्ध ज्ञानमय आत्मा में मैं विशुद्ध साक्षीरूप आत्मा ही हूँ, मुझमें भेदज्ञान की दृष्टि ह…
  45. Verse 47तब अज्ञानियों को बोध देने के लिए तथा ग्रतिवादियों फर विजय पाने के लिए निचकारी विद्वानों क…
  46. Verse 48इतनी बात से विद्वानों का पाण्डित्य बतलाना ही परमपद हैं, यह नहीं जानना चाहिए, किन्तु कोई द…
  47. Verse 49परमपद का ही विशेषरूप से वर्णन करते हैं / भद्र, जो बाहर के साधनों से निर्मुक्त है, जो अन्द…
  48. Verse 50परमपद को स्वग्रकाशस्वरूय क्यो मानना चाहिए, उसे विष्यचुख के सद्र भोग्य ही क्यो न माना जाय,…
  49. Verse 51वक्ष गग आदि में चहल-पहल हो या न हो, पर पर्वत की शिला निश्चल स्थित होने से जैसे जड़ हैं, क…
  50. Verse 52अतः अन्तिम स्थिति में वह स्वप्रकाशरूप ही फलित होता हैं, यह कहते हैं / जैसे लौकिक आत्मा मे…
  51. Verse 53वहाँ पर (परमपद में) न अहन्ता है, न त्वत्ता है, अहन्ता का अभाव है, न अन्यरूपता है। वह निर्…
  52. Verse 54उसका दूसरे से प्रकाश होना ही संसार है, यह कहते हैं / इस चेतन का यानी निर्वाणरूप स्वप्रकाश…
  53. Verse 55विषय सम्बन्ध के अभाव से प्राप्त अवेतनता तो मो में इष्ट ही है, यह कहते हैं । चेतन की विषयो…
  54. Verse 56मोक्ष में विषयों की स्थिति का निवारण करते हैं / भद्र, देश, काल आदि से अपरिच्छिन्न, शान्तस…
  55. Verse 57इस तरह केवल अन्तर्मुखतामात्र से स्वतः प्रिद्ध मुक्ति का उपपादन कर अब बर्हिमुखतामात्र से ह…
  56. Verse 58इसी तरह ये जो मन, बुद्धि, अहंकार आदि हैं, वे सब अन्तर्मुखदशा में चेतनरूप हैं और मन, बुद्ध…
  57. Verse 59इसी रीति से आन्तर ओर बाह्य जितना जग्रत्‌ है, वह सव चेतन्येंकरस ही सिद्ध हो जाता है, ऐसी स…
  58. Verse 60समस्त दृश्यों का विनाश हो जाने पर अन्त में बच जानेवाला संविन्मात्रस्वकृप जो आत्मा ङ वह थु…
  59. Verse 61तब विवेकियों की योक्तिक इष्टि से जगत्‌ कैसा हैं / इसे कहते हैं । जैसे आँख के प्रणिधानरूप…
  60. Verse 62यह मैं चिदाकाशस्वरूप ही हूँ, इस प्रकार निश्चयकर वासनानिर्मुक्त हो उत्तमशान्ति से सम्पन्न…
  61. Verse 63यह चिदाकाशरूप ही मैं हूँ, इस प्रकार के निश्चय से युक्त जो भी दूसरा पुरुष है वह तत्त्वज्ञ…
  62. Verse 64क्या जीवों की अविद्या को चिदात्मा नष्ट कर देता है या जड़ ? प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं है, क…
  63. Verse 65क्या युक्त पुरुष जगत्‌ को जानते हैँ या नहीं 2 यदि जानते हैं; तो सारी और युक्त दोनों में क…
  64. Verse 66जब यूलअज्ञान रहता है तभी उसके बल से बाह्य अर्थो के अज्ञान यूर्खता के सम्पादक होते हैं। यू…
  65. Verse 67ब्रह्मज्ञान ओर जयद्श्रम सभी अज्ञानरूप ही हैं; परन्तु अज्ञाननिव्त्ति तो अजान नहीं हैं, जिस…
  66. Verse 68तब जीवन्युक्तों की मुक्तता ही न रही, क्योकि उन्हें वक्ष आदि इन्द्रियों से बाह्य पदार्थों…
  67. Verse 69जिस तरह सुषुप्ति अवस्था में स्वप्न का विलय हो जाता है उसी तरह तत्त्वज्ञान होने पर समाधि म…
  68. Verse 70समस्त दृश्य क्यो विलीन हो जाता हैं डल प्रश्न पर वे श्रान्तिरृप है, यह उत्तर देते हैं / जै…
  69. Verse 71अतएव बाधित अर्थ की वासना वासना ही नहीं है, ऐसी स्थिति में ज्ञानी वाग्ननारहित ही हैं, यह क…
  70. Verse 72चित्र-विचित्र भुवन, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, विहित. निषिद्ध अनेक कर्म एवं विहित निषिद्ध…
  71. Verse 73जब आत्मा में कर्तृत्व- भोक्तृत्व की सत्ता हो, तब तो समस्त छुख-दुःख के भोग के लिए पुण्य-पा…
  72. Verse 74जिस अहंकार में हम लोगों को यह ममताबुद्धि होती है उसका भी कहीं अस्तित्व नहीं है। इसलिए समस…
  73. Verse 75भद्र, समस्त द्वैत से शून्य तत्त्ववेत्ता पुरुष चाहे व्यवहार में रहे या काष्ठपाषाण के सदृश…
  74. Verse 76इस तरह मायिक विवर्तवाद के सिद्धान्त को लेकर आरोपित जग्रत्‌ के अपवाद से तत्त्ववेत्ता पुरुष…
  75. Verse 77से विचित्रता का नाम ही उठ जायेगा । सर्वसाधरण धर्म में न तो विचित्रता रहती है और न वह किसी…
  76. Verse 78सवके अनुभव पर बढ़ी हुई जयत्‌-विवित्रता का यदि युक्ति के अभाव में आप खण्डन करते हैं. तो ज्…
  77. Verse 79हे श्रीरामजी, आप ब्रह्नज्ञानियों द्वारा प्रेमपूर्वक्त सेवित तथा छोड़ने लायक नहीं जो अज, अ…