Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

मुक्तताया अहंतेयमभावो भावनं क्व च । तयैवान्विष्यते सेति जात्यन्धश्चित्रमीक्षते ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

परमपद को स्वग्रकाशस्वरूय क्यो मानना चाहिए, उसे विष्यचुख के सद्र भोग्य ही क्यो न माना जाय, इस पर कहते हैः/ यह जो अहम्भाव है, वह मुक्ति का अभाव है अर्थात्‌ मुक्ति का पूर्वकालिक अभाव है । इसलिए अहम्भाव से मुक्ति की भावना कहाँ होगी ? अभाव से किसी प्रतियोगी का अनुभव तो हो नहीं सकता | मुक्तरूपता द्वारा भी मुक्ति की भावना नहीं हो सकती, क्योकि मुक्तरूपता ओर मुक्ति तो एक ही है, इसलिए दोनों पक्षों में जन्मान्ध पुरुष चित्र देखता है, यही न्याय आ जाता है