Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
जीवतोऽप्युपशान्तस्य व्यवहारवतोऽपि च ।
शववद्यदवस्थानं तदाहुः परमं पदम् ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
इतनी बात से विद्वानों का पाण्डित्य बतलाना ही परमपद हैं, यह नहीं जानना चाहिए, किन्तु
कोई दूसरा ही हैं, यह कहते हैं।
यद्यपि जी रहा है और यद्यपि व्यवहार भी कर रहा है, तथापि परम शान्तिरूप ब्रह्म में विश्रान्त
पुरुष की मुदे के सदृश जो स्थिति है, वही परमपद कहलाती है