Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 79
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, verse 79 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 79
संस्कृत श्लोक
शमममलमहार्यमार्यजुष्टं शिवमजमक्षयमासितं समं यत् ।
तदवितथपदं तदास्व शान्तं पिब लल भुङ्क्ष्व भवानयं हि नास्ति ॥ ७९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, आप ब्रह्नज्ञानियों द्वारा प्रेमपूर्वक्त सेवित तथा छोड़ने लायक नहीं जो अज,
अविनाशी, कल्याणरूप, परमार्थसत्यभूत, नित्यसिद्ध, निर्मल, शान्त, सम शिवपद है, तद्रूप ही
बनकर स्थित हो जाइये । व्यवहार में साधारणजनों के सदुश यद्यपि आप खाइये, पीजिये, खेलिये,
तो भी आप मुक्त ही हैं, क्योंकि आपको दृश्य प्रपंचरूप बन्धन है ही नहीं