Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
जाग्रत्यपि सुषुप्तश्चेज्जागर्षि च सुषुप्तके ।
जाग्रत्सषुप्तयोरैक्यात्तदस्त्यसि निरामयः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
जाग्रत की अवस्था में भी यदि आप सब प्रकार
की उपाधियों का विलयकर सुषुप्ति अवस्थावाले हो जाते हे तो सुषुप्ति अवस्था में भी आप जाग्रत
अवस्थावाले ही हे क्योकि अज्ञान आवरण उस समय रहेगा ही नहीं । जाग्रत ओर सुषुप्ति को अलग
करनेवाले अज्ञान ओर अज्ञानकार्यं का बाध हो जाने पर ये दोनों अवस्थाएँ एक हो जाती हैं और
एकता हो जाने पर जो सन्मात्ररूप बच जायेगा, वही निर्विकार सन्मात्र-स्वरूप आप हैं