Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
दिक्कालाद्यनवच्छिन्ने शान्ते शान्तात्मनि स्थिते ।
चेत्यं न संभवत्येव कः किं चेतयते कथम् ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
मोक्ष में विषयों की स्थिति का निवारण करते हैं /
भद्र, देश, काल आदि से अपरिच्छिन्न, शान्तस्वरूप ही जब मोक्ष स्थित है, उस शान्तरूपमें
चेत्य की सम्भावना ही नहीं हो सकती, ऐसी स्थिति में कौन किसका, किस तरह प्रकाश करेगा ?