Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
यन्मयो हि भवत्यङ्ग पुरुषो वक्ति तादृशम् ।
ज्ञेयमात्रमयश्चाहं वागतीते पदे स्थितः ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रिय, वक्ता पुरुष
जिस रूप का होता है, उसी रूप का कथन करता है, मैं तो तत्त्वसाक्षात्कार से बोधित होनेवाली जो
वस्तु (ब्रह्मरूप) है, तन्मय बनकर वाणी से परे परमपद में स्थित हूँ