Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 67
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, verse 67 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 67
संस्कृत श्लोक
अहं ब्रह्म जगच्चेदमित्यविद्यामयो भ्रमः ।
असत्यः प्रेक्षया ध्वान्तं दीपेनेव न लभ्यते ॥ ६७ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मज्ञान ओर जयद्श्रम सभी अज्ञानरूप ही हैं; परन्तु अज्ञाननिव्त्ति तो अजान नहीं हैं,
जिससे युक्ति न हो, इस आशय से कहते हैं /
“अहं ब्रह्मास्मि" इस प्रकार का ब्रह्मज्ञान तथा यह जगत् सब अविद्यामय असत्य भ्रम है। यह
ब्रह्माकार अखण्डवृत्ति से, दीपक से अन्धकार की नाई, निकल जाता है