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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

श्रीवाल्मीकिरुवाच । राघवे गदति त्वेवं वसिष्ठो वदतां वरः । तूष्णीमेव मुहूर्तार्धमतिष्ठत्स्पष्टचेष्टितः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

वसप्निष्ठजी को तो अहम्भाव आदि हैं ही नहीं; परन्तु हमारी और श्रोताओं की अज्ञान- द्वष्टि के ही कारण उन्होंने उसका अवलम्बन किया था, जब सबको तत्वज्ञान हो बुका तब तो मेरे प्रश्न का मोन ही उत्तर है, इस आशय से वश्तिष्ठजी की चुपचाप स्थिति कहतें हैं। वाल्मीकि मुनि ने कहा : जब श्रीरामजी ने ऐसा प्रश्न किया, तब वक्ताओं में अग्रणी महाराज वसिष्ठजी आधे मुहूर्त तक चुपचाप स्थित रहे । उनकी ऐसी चेष्टा स्पष्ट विदित हो रही थी