Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
स्पन्दनेऽस्पन्दने चैव यत्पाषाणवदासितम् ।
अजडस्यैव तद्विद्धि निर्वाणमजरं पदम् ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
वक्ष गग आदि में चहल-पहल हो या न हो, पर पर्वत की शिला निश्चल स्थित होने से जैसे
जड़ हैं, केसे ही अहंकार प्राण आदि में चहल-पहल हो या न हो, पर परमपद निश्चवल :स्थित हैं,
अत: उने जड़ क्यो न माना जाय, इस पर कहते हैं ।
अहंकारादि का स्पन्दन (चहल-पहल) या अस्पन्दन होने पर भी जो पाषाण के सदृश जिसका
निश्चल अवस्थान है, वह अजड़ का ही है, जड़ का नहीं है, यह आप जानिए | वही परमपद, अजर
(क्षीणता आदि दोषों से रहित) मोक्ष है