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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 72

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, verse 72 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 72

संस्कृत श्लोक

संकल्पेष्वद्भुतं भव्य स्वप्नमायेन्द्रजालकम् । यद्वत्संसृतयस्तद्बदृष्टेऽप्यास्था किमत्र वै ॥ ७२ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्र-विचित्र भुवन, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, विहित. निषिद्ध अनेक कर्म एवं विहित निषिद्धकर्मफलों की भोगसिथति तथा ईश्वर इन सबका जहाँ पर अस्तित्व हैं ऐसे इस अद्भूत जयत्‌ को आप कैसे असद्‌. अनृत और स्कल्पस्वरुप पूर्वोक्‍्त युक्तियों से मानकर खण्डित करते हैं 2 स्रंकल्प, मनोरथ आदि स्थलों में तो उस तरह के पदार्थ है नहीं; ऐसी आशंका कर वहाँ पर भी च्रिंकल्प आदि स्थलों में भी) अद्भूत अर्थम्नत्ता का दिगृदर्थन कराते हैं / हे भव्य श्रीरामजी, संकल्पजनित पदार्थों में स्वप्न, माया, इन्द्रजाल जैसे चित्रविचित्र अद्भुत अर्थ विद्यमान हैं, वैसे ही ये सब संसार अद्भुत ही हैं । प्रत्यक्षतः दिखाई देनेवाले स्वप्न आदि अर्थो में क्या आस्था बाँधकर बैठे रहना अच्छा है एवं संसार में भी आस्था बाँधकर बैठे रहना क्या अच्छा है ?