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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

स्वपक्षोद्भावनपरा अहंतात्मैकवर्धनम् । मोक्षार्थमप्युद्यमिनो नयन्ति शतशाखताम् ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

तब अज्ञानियों को बोध देने के लिए तथा ग्रतिवादियों फर विजय पाने के लिए निचकारी विद्वानों की प्रवृत्ति केसे होगी, इस पर कहते हैं / शिष्यों का सन्देह दूर करने के लिए या प्रतिवादियों पर विजय पाने के लिए उद्यमशील विद्वान श्रुति, युक्ति आदि प्रमाणों के द्वारा अपने पक्ष के समर्थन में तत्पर होकर बाधित का भी आहार्यारोप कर अहन्तारूप एक ही आत्मा को बढ़ाते हैं और उनका अनेक शाखाओं में विस्तार करते हैं, परन्तु अज्ञानी के सदृश मोहित नहीं होते