Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
द्विविधो भवति प्रष्टा तत्त्वज्ञोऽज्ञोऽथवापि च ।
अज्ञस्याज्ञतया देयो ज्ञस्य तु ज्ञतयोत्तरः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रश्न की चरम सीमा बतलाने के लिए भूमिका बाँधते है /
भद्र, प्रश्नकर्ता दो तरह के होते हैं एक तो तत्त्वज्ञ और दूसरे अज्ञानी । इनमें अज्ञानी प्रश्नकर्ता
को अज्ञ बनकर उत्तर देना पड़ता है और ज्ञानी को ज्ञानी बनकर