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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 59

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, verse 59 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 59

संस्कृत श्लोक

संविन्मात्रे समे स्वच्छे सबाह्याभ्यन्तरे तते । अभिन्ने भेदबुद्धिर्वा किमनर्थाय जृम्भते ॥ ५९ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी रीति से आन्तर ओर बाह्य जितना जग्रत्‌ है, वह सव चेतन्येंकरस ही सिद्ध हो जाता है, ऐसी स्थिति में चिति की बहियुखितारऊुप जो भेवबुद्धि हैं, वही केवल व्यर्थ और अनर्थ की हेतु है, इसे कहते हैं / यह विस्तृत जितना बाह्य-आभ्यन्तर जगत्‌ है, वह सब सम, स्वच्छ एवं अभिन्न संविद्रूप ही है, इसमें जो भेदबुद्धि की जाती है, वह अनर्थ के लिए ही विकसित होती है