Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
यद्येवं मुनिशार्दूल तदहंप्रत्ययात्मकः ।
भवानेवेह किं तावद्वसिष्ठाख्यः स्थितो वद ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
समस्त द्वैत का अयलाय हो जाने पर तो आपका भी अहंकार /वस्तिष्ठजी का अहंभाव) रहेगा
नहीं; डस स्थिति में आपके वक्तायन आदि व्यवहार कैसे, इसी आशय से श्री रामभद्र पूछते हैं
श्री रामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिशार्दूल गुरूवर, यदि ऐसी बात है, तो अहम्भावरूप वसिष्ठनाम
के आप ही यहाँ स्थित हे क्या ? यानी आपके व्यवहार कैसे, यह कहिये, क्योंकि द्वैत के अपलाप
से आपमें भी अहम्भाव तो रहा नहीं