Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 117
एक सौ पन्द्रह सर्ग समाप्त एक सौ सोलहवाँ सर्ग संग्राम, आकाश, वियोगी, पर्वतग्राम, पर्वत-गुफा के मेघ और कौओं का वर्णन ।
81 verse-groups
- Verse 1अनुचरों ने कहा : महाराज, यहाँ पर युद्धरत सीमाप्रान्त के राजाओं के अस्त्र-शस्त्रों की राशि…
- Verse 2महाराज, देखिये, देखिये, अप्सरायें वीरों द्वारा संग्राम में अभिमुख मारे गये हजारों वीर योद…
- Verse 3रण में शत्रुओं का संकट उपस्थित होने पर बलवान् विजेता से धर्म के बिना उसका वध शोभा नहीं द…
- Verse 4लोगों के द्वारा अनिन्दित लक्ष्मी, श्रीयुक्त आरोग्य, धर्मयुक्त और दूसरे के लिये जीवन-ये ही…
- Verse 5जो युद्ध में सामने आये हुए योद्धा को धर्म के अविरोध से योद्धा के अनुरूप (~) मारता है, वही…
- Verse 6हे राजन्, उद्यत शस्त्रास्त्ररूपी भूषणों से भासुर इस शूरवीर पुरुष में संग्राम लक्ष्मी के…
- Verse 7बाण, शक्ति, गदा, बन्दूक, त्रिशूल, तलवार, भाले, तेज तोमर, चक्र आदि हथियारों से लदे हुए ये…
- Verse 8महाराज, बलवान्, मेघरूपी सागर से भरे हुए आकाश को देखिये, चंचल तारेरूपी लम्बे हार से युक्त…
- Verse 9जिस आकाशतल में सुर और असुरों के अनेक विमान तारों के सदृश मालूम पड़ते हैं, जो अश्विनि आदि…
- Verse 10मेघो के अगणित आडम्बरं से, प्रलयकाल की असंख्य अग्नियों से, पर्वतों के क्रोधपूर्णं पंखों के…
- Verse 11हे साधो, हे आकाश, तुम सूर्य को निरन्तर अपनी गोद में झुलाते हो, केवल सूर्य को नहीं, भगवान्…
- Verse 12हे आकाश, तुम मलिन हो, जहाँपर चन्द्रबिंब छिद्ररूप तुमसे व्याप्त हो काजल के तुल्य काला हुआ…
- Verse 13अथवा भले ही मलिनता आदि भी दोष ठुममें लो फिर भी निर्विकारिता के बलपर भी वोक्युक्त सक अनर्थ…
- Verse 14हे उदारमते, हे आकाश, तुम अपनी उन्नति चाहनेवाले प्रलयकालीन मेघो, वृक्षों ओर लताओं के अवकाश…
- Verse 15हे आकाश, तुम अत्यन्त निर्मल, स्वच्छ, चमकदार और उन्नत होने के कारण उत्तम देवता आदि के उत्त…
- Verse 16हे आकाश, मैं तुम्हें सोने के समान कसौटी के पत्थर पर धिसना बहुत अच्छा समझता हूँ । कसौटी के…
- Verse 17से तुम्हारा कलेवर लाल हो जाता है, रात्रि मेँ तुम काले बन जाते हो । अथवा सदा कुछ भी सद् व…
- Verse 18हे आकाश, तुम अकिचन हो तुम्हारे पास कुछ नहीं है, फिर भी विपुल बुद्धिवाले तुम सब कार्यों को…
- Verse 19आकाशमार्ग में पथिक के विश्राम के साधन न तृण हैं और न जल है, गाँव तो है ही नहीं, कसबे और न…
- Verse 20रात्रि आकाश को अन्धकाररूपी वस्त्र से, चन्द्रमा कर्पूर के प्रवाह के तुल्य शुभ्र किरणों से,…
- Verse 21आकाशरूपी आँगन धूप, बादल, धूलिपटल, अन्धकार, सूर्य, चन्द्रमा, तारावृन्द, विमानराशि, गरूड, प…
- Verse 22कोर्ड दूस पार्श्वचर त्रिभुवन का एक जीर्ण शीर्ण गृह के रूप में वर्णन करता है / देव, इस त्र…
- Verse 23जैसे माली और मालिन-पति-पत्नी विकसित (फले-फूले) बाग की रक्षा करते हैं वैसे ही इस प्रकार के…
- Verse 24आकाश वृक्ष आदि वृद्धिशील वस्तुओं की अधिक उन्नति को रोकता है, उन्हें बहुत ऊँचा नहीं बढ़ने…
- Verse 25जिसमें लाखों जगत् विलीन होते हैं और जिससे उत्पन्न होते हैं उस आकाश को शून्य कहा जाता है,…
- Verse 26आकाश में सब भूत विलीन होते हैं, आकाश से ही उत्पन्न होते हैं और आकाश में ही स्थिर रहते हैं…
- Verse 27यदि अग्नि से विनगारियो की तरह आकाश से ही जगत् के जन्म, स्थिति और लय मानते हो तो आकाश जड़…
- Verse 28जिसमें यह जगद्भ्रान्ति का उदय और अस्त होता है, जो निस्सीम आकाश अपने शरीर में अशेष वस्तुओं…
- Verse 29कोई पार्थ॑वर्ती पर्वत पर विशेष कौदुक दिखनाता हुआ कहता है / पर्वत के शिखर पर वनभूमि में वन…
- Verse 30दसय अनुचर कैसा ही दूसरा कोतुक दिखाता हुआ कहता हैं। हे नाथ, पर्वतशिखर के ऊँचे पेड़ के कमलप…
- Verse 31सामने पर्वत-शिखर के वृक्ष में पत्तों की आड़ में वियोगिनी अतएव बार-बार आँसू गिरा रही वह वि…
- Verse 32क्यों वह वहीं पर बैठी है, ऐसी आशंका होने पर कहता हैं / इसके युवक सुन्दर पति को (विद्याधर…
- Verse 33हे राजन् हमारा यहाँ आना और हमारा दर्शन होना यही मुनि ने इसके शापान्त की अवधि की थी,.देखि…
- Verse 34दसरा अनुचर पर्वतो का वर्णन करता है / पर्वतरूपी हाथियों के वृक्षरूपी खड़े हुए रोंगटों मे प…
- Verse 35अहा, पुष्परूपी शुभ्र वस्त्र ओदी हुई कावेरी बड़ी भली लगती है, जो मछलियों की तेज उछालों से…
- Verse 36हे राजन्, इस सुवेलपर्वत शिखर पर सूर्य चमचमा रही पूरी सोने की शिला तटग्रदेश में चंचल सागर…
- Verse 37राजन्, पर्वतो पर अहीरों की टोली के घरों की शोभा देखिये । इनके हर एक घर निकटवर्ती मोटे-मो…
- Verse 38खिले हुए फूलों से अत्यन्त शुभ्र पुष्पवाटिकाओं से भरे हुए ये गाँव जिनमें मन्दार के वृक्षरू…
- Verse 39इस पर्वतीय ग्राम के झुण्डों के बीच मेँ तुरन्त खिली हुई कलियों की पँखुड़ियों के अन्दर छिप-…
- Verse 40मृगो द्वारा झूलने के लिए झूला बनाई गई लताओं से हलचल वाले जंगल के अन्दर गुफाओं में गा रही…
- Verse 41पर्वतराज के वनों के मध्य में स्थित ये गाँव जिन्होंने भाँति-भाँति के फूले हुए फूलों की राश…
- Verse 42स्वर्गस्थ चन्द्रनगरके उपवनों के भाग जैसे ये मनमोहक पर्वतीय गाँव, जिनमें अरनों का जल अविरत…
- Verse 43ये पर्वत-ग्राम, जिनमें बिजली वेष्टित गँभीर गर्जन-तर्जनवाले निकटवर्ती बादलों के गर्जन से न…
- Verse 44एक बगल में चल रहा चन्द्रमण्डल ही जिनका आभूषण है, जल से भरे मेघरूपी हाथी जिनमें आराम करते…
- Verse 45अपनी मनोहारिणी सुगन्धि से नन्दनवन के केन्द्र की तरह सुन्दर कल्पवृक्ष के फूलों के गुच्छों…
- Verse 46हरिणियों के निनाद से रमणीय, मनोहर हारीत पक्षियों से सुन्दर पर्वत-ग्रामों में काम के नगरों…
- Verse 47राजन्, स्फटिक के खम्भों की राशियों की तरह रमणीय झरनों के जलो से सुशोभित इस ग्रामरूपी कन्…
- Verse 48राजन् देखिये, झरझर शब्द कर रहे रनों के जल से सुहावन इस ग्राम में निकुंज में विलासवती मयू…
- Verse 49पर्वत- कन्दराओं से अपनी गोद में छिपाये गये ग्राम के मैदानों में, जिनमें बगीचों के पेड हार…
- Verse 50हे श्रीमानों के स्वभाव के समान महाउदार स्वभाववाले, हे महाशय, हे सन्तापहारिन्, अत्यन्त उन…
- Verse 51हे मेघ, तुम नित्य समुद्र, गंगा आदि सुतीर्थ की जलराशि से स्नान करते हो, ऊँचे स्थान पर बैठक…
- Verse 52अनुचित स्थान पर पड़ी हुई सुन्दर वस्तु भी असुन्दर हो जाती है । दुष्ट मेघरूप अयोग्य स्थान क…
- Verse 53अहा ! मेघ ने जल बरसाया, अहा ! जल से पृथिवी आप्लावित हो गई, अहा ! जैसे धनाढ्य पुरुष अपने द…
- Verse 54को पारश्ववर दया, उदारता आदि गूर्ण के वर्णन के किलमिले में उनसे विपरित निर्वयता, अनुदारता…
- Verse 55यदि मूर्ख सर्वथा निन्दनीय ही है; तो नरेश आदि उनको अपने पास क्यों रखते हैं 2 इस संशय पर कह…
- Verse 56भोग-परम्पराओं मे संलग्न (विषयलम्पट) मूर्ख धतूरा खाने से उन्मत्त हुए, मदिरा आदि पीने से मद…
- Verse 57यद्यपि सिह और कुत्ता दोनों में पशुता समान है यानी दोनों तिर्यग् योनि के जीव हैं, तथापि म…
- Verse 58हे नित्य अपवित्र, अपने प्रियजन के प्रति हू-हू करने में प्रवीण, गली -कूच में घूमने मेँ सार…
- Verse 59कर्मो की विषमतावश अत्यन्त विषम जगत् की रचना कर रहे विधाता ने अपने दौहित्र (सरमा नाम की द…
- Verse 60तुमसे बढ़कर अधम कौन है ऐसा पूछनेवाले के प्रति हँसते हुए कहा : जो अज्ञान, अपवित्र देहादि म…
- Verse 61कुत्ता सदा अपवित्र वस्तु खाता है, अति अपवित्र विष्ठा के ढेर में ही खेलता है, बेचारे जीवित…
- Verse 62कहीं पर नदी के किनारे निर्माल्य, अक्षत आदि खाने के लिए शिवलिंग के ऊपर कोव-कोव कर रहे कवे…
- Verse 63दूसरा अनुचर तालाब में कॉक्-कॉँव करते हुए घूम रहे कौ के ग्रति कहता है / अरे निन्द्य कौए, अ…
- Verse 64अपने मित्र के प्रति कोर्ड कहता हैं / कौआ नाना प्रकार की अपवित्र वस्तुओं को खाता है, मृणाल…
- Verse 65विविध वनपुष्पों के केसर से धवल देहवाले कौए को लोगों ने हंस समझा । बाद में जब उसे सड़े-पड़…
- Verse 66समान रंग के (एक से) पंखवाली कोयलों में हिलेमिले कौए को कौन पहचानता यदि वह स्वयं काँव-काँव…
- Verse 67महाअरण्य की मिट्टी की बनी पुरानी दीवार के ऊपर बैठा हुआ यह कौआ जैसे रात्रि के समय लोगों के…
- Verse 68वेग से उड़ रहे या कलियों के आस-पास मंडरा रहे सारसा द्वारा चटचट खिल रहे कमलों के मकरन्द से…
- Verse 69हे राजन्, खिले हुए कमलों के आकार स्वानुरूप स्थानरूप सरोवर में तैर रहे राजहंसो के साथ थप्…
- Verse 70कवन; चोरी आदि से मुझे प्राप्त होने वाले धनावि भाग को न्यायदुक्त उपाय से कोर्ड सज्नन न ले…
- Verse 71कमलवन में विविध क्रीडाएँ कर रहे कलंकसदृश कौए को जोर जोर से काँव-काँव कटुशब्दों के श्रवण स…
- Verse 72खलो की सभा मेखल ही योग्य हैं । वहाँ फर एक भी साधु का रहना ठीक नहीं है, यों अन्योक्ति द्वा…
- Verse 73रंग, शरीर को ढकनेवाले पंख और शरीर की गठन से कौओं के झुण्डों के तुल्य कोयल, मूर्खो की सभा…
- Verse 74फूलों की लता कोकिल के धीरे-धीरे फूलों की पेंखुरियों के छेदन को भले सहन कर सकती है, किन्तु…
- Verse 75हे मधुरकण्ठ हे कोयल, यहाँ पर कानों के लिए उत्सवरूप तुम्हारे कलरव को कौन सुनता है ? जो रति…
- Verse 76उपवन में तान सुनने के प्रेमी लोगों के आगे कोयल का मनोहर बच्चा कोमल वाणी से महोत्सवतुल्य क…
- Verse 77अयोग्य श्रोताओं के बीच अनवर में अयोग्यों को योग्य समझकर श्रान्त से अपने गुणों का प्रदर्शन…
- Verse 78रंग-बिरंग के नये-नये अंकुरों से भरे हुए चैत्र के महीने में जो वियोगिनी नायिका है, वह कहती…
- Verse 79कौओं के झुण्ड में मौन, चेष्टा, पंखादिचालनरूप व्यवहार, वर्ण, रंग और आकार एक-सा होने पर भी…
- Verse 80अरे भाई कोयल, कर्णकटु काँव काँव कर रहे कौओं के झुण्ड से भरा हुआ वह शिशिर का समय है, वसन्त…
- Verse 81एक आश्चर्य है उसके बाद यह कौवी माँ इस कोयल बच्चों को चोंच और पंजों से घायल करती है, यह दू…