Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 51
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
हे मेघ, तुम
नित्य समुद्र, गंगा आदि सुतीर्थ की जलराशि से स्नान करते हो, ऊँचे स्थान पर बैठकर सब जीवों
को जल देते हो, शुद्ध होकर मुनियों का-सा व्रत लेकर वनभूमि में निवास करते हो एवं शरत्काल
में यद्यपि तुम खाली हो जाते हो फिर भी तुम्हारे शरीर पर अतिउत्कृष्ट धवलकान्ति ही शोभा पाती
है । यों सर्वथा श्रेष्ठ होने पर भी तुम जलदान के लिए उठकर जो बिजली ओर अग्नि के साथ
कटुशब्द करते हो यह तुम्हारा आचरण कैसा है ? सर्वथा अनुचित है