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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

कूपवापीसरोब्धीनां दृश्यते यादृगन्तरम् । नारीपुरुषतोयानां विज्ञेयं तादृगन्तरम् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे आकाश, मैं तुम्हें सोने के समान कसौटी के पत्थर पर धिसना बहुत अच्छा समझता हूँ । कसौटी के पत्थर के सिवा दूसरी तुम्हारी परीक्षा लेने की जगह नहीं है । क्योकि तुम शून्य होते हुए भी बादलों, तारों, विमानों, सूर्य, चन्द्र॒ ओर वायुओं को धारण करते हो, चमकते हो ओर निष्प्रयोजन भी नहीं हो । सोने के सब गुण तुममें विद्यमान हँ, अतएव तुम्हारे गुणों की परीक्षा के लिए भी सोने के गुणों की परीक्षा लेने का स्थान समुचित है, यह भाव है