Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
यथेदं ब्रह्मणो दृश्यमविकारादि नेतरत् ।
यथाम्भसि तरङ्गादि राजन्पृथगिव स्थितम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे उदारमते, हे आकाश,
तुम अपनी उन्नति चाहनेवाले प्रलयकालीन मेघो, वृक्षों ओर लताओं के अवकाश प्रदान द्वारा
उन्नति के कर्ता हो, सूर्य, चन्द्रमा, मेघ, किन्नर, वायुस्तरों ओर देवताओं को धारण करते हो
(आधार हो), सम और निर्मल स्वभाववाले तुम्हारे सब कार्य रमणीय ही हैं, सुन्दर ही हैं, लेकिन
अग्नि और सूर्य के प्रज्वलन को अवकाश देने के कारण तुममें जो सन्तापकता है तुम्हारा यह
काम हमारे खेद के लिए है, सुख के लिए नहीं है यह वनाग्नि ओर सूर्य के सन्ताय से सन्तप्त
पुरूष की उशित ह