Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 50

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

हे श्रीमानों के स्वभाव के समान महाउदार स्वभाववाले, हे महाशय, हे सन्तापहारिन्‌, अत्यन्त उन्नत ओर गंभीर आकृतिवाले हे मेघ, तुम पर्वतं के शिरोभूषण हो और खेत, पवन आदि की समृद्धि के कारणभूत जल के एकमात्र आश्रय हो । यों हजारों गुण तुममें हैं फिर भी हर्ष से वरस रहे तुमने जो अपात्रभूत ऊसर प्रदेश, तालतलैया, कंटीले पेड आदि में सुन्दर उपजाऊ खेतों के समान जलविभाग का क्रम अपनाया है, यह तुम्हारा सत्‌-असत्‌ पात्र का अपरिज्ञान सच्रनों के मन को कटि की तरह बेधता है । यदि तुम्हारे ऐसे सुपात्रों के उत्कृष्ट गुणों का आदर न करेगे, तो कौन करेगा ? (यहाँ से लकर प्रायः सर्ग की समाप्ति तक के सब श्लोक अन्योकित से भरे हैं / मेघ के बहाने किसी दानी महाशय के प्रति भी जो पात्र-अपात्र का विवार नहीं रखता हैं. यह उक्ति लागू होती है