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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 78

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 78 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 78

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

रंग-बिरंग के नये-नये अंकुरों से भरे हुए चैत्र के महीने में जो वियोगिनी नायिका है, वह कहती है-हे नित्य प्रशंसनीय आकृतिवाले, हे कुहक रहे कोयल, यह चैत्र महीना किसका है ? इस तरह के मेरे प्रश्न के उत्तर में तुमने अपने मधुर स्वर से जो मीठी वाणी की है, खेद है, यह दुःखदायी का (मेरा) वसन्त नहीं है, किन्तु अपनी सहचरी के साथ गा रहे तुम्हारा ही वसन्त है । ऐसी परिस्थिति में तुम्हें मम मम" (मेरा मेरा) कहना चाहिये, "तव तव" इस तरह का तुम्हारा असत्य वचन मुझे पीड़ित करने के लिए ही है