Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
आकीर्णसीकरकरालदिगन्तराले फुल्लोत्पलाब्जपटलोदररेणुगौरम् ।
आमोदमत्तमधुपद्विजगीतिगीतं यातं वितानकमिवाम्बरगं वहन्तम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
रण में शत्रुओं का संकट
उपस्थित होने पर बलवान् विजेता से धर्म के बिना उसका वध शोभा नहीं देता, किन्तु युवावस्था
में धर्मयुक्त (विहित) सुरत के समान धर्म से युक्त युद्ध ही शोभा देता है