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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

पादाक्रान्तमहेभमस्तकतटः पद्माकरैकालयः कह्लारोत्पलकुन्दचम्पकलतासंभोगसौभाग्यवान् । भृङ्गोऽप्येष विधेर्वशेन शिशिरे लोष्टं तृणं स्वादयन् शीते शुष्कबकत्यहो नु विपदा दैन्ये मनो दीयते ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

ये पर्वत-ग्राम, जिनमें बिजली वेष्टित गँभीर गर्जन-तर्जनवाले निकटवर्ती बादलों के गर्जन से नाच रहे मयूरो के अभिनव नृत्यों से बिखरे हुए मयूरो के झुण्डों के नये-नये मोरपंखों से चन्द्ररूपी मणिराशियाँ उड़ी हैं, दिव्य बनकर ब्रह्मलोक को अपने सन्मुख फीका बना रहे हैं