Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
येषां पुष्पलतास्वादैरनन्यमनसां गतम् ।
भृङ्गाणामायुरायामि त एव सुभगोत्तमाः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश वृक्ष आदि वृद्धिशील वस्तुओं की अधिक उन्नति को रोकता है, उन्हें बहुत
ऊँचा नहीं बढ़ने देता ।
शका - आकाश में कोर्ड निरोधक व्यापार नहीं, अतः वह निरोध का कर्ता हैं ही नहीं; इसलिए
उसमें विरुद्ध निरोधकर्तत्व कैसे हो सकता है?
उत्तर : यद्यपि आकाश अकर्ता ही है, तथापि महान् आकाश में कर्तृता महिमा से ही उदित
होती है