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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

हेलया राजहंसेन यत्कृतं कलकूजितम् । न तद्वर्षशतेनापि जानात्याशिक्षितुं बकः ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

अहा, पुष्परूपी शुभ्र वस्त्र ओदी हुई कावेरी बड़ी भली लगती है, जो मछलियों की तेज उछालों से फटी हुई जल लहरियां में खेल रही शब्दायमान कुररियों से भयंकर है तथा जिसके तट ओर जलमय प्रदेश निःशंक मृगकुल से भरे हैं