Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
दोलाकमलनीडस्थां दृष्ट्वा खे प्रतिबिम्बिताम् ।
हंसो हंसीमनुसरन्मण्डले नेह चेतति ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन् हमारा यहाँ आना और हमारा दर्शन होना यही मुनि ने इसके
शापान्त की अवधि की थी,.देखिये यह वृक्षभूत विद्याधर हम लोगों के दर्शन से ही शापमुक्त हो गया
है, अतः वृक्षता का त्यागकर युवती विद्याधरी का शाखाओं के बहाने उन्हीं बाहुओं से खूब आलिगन
करता है । खिले हुए फूल ही उसके हास बन गये हैं