Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
हरिवक्षोगता लक्ष्मीरपि शोभार्थमेव यत् ।
बिभर्ति कमलं हस्ते कान्याशंसाधिका भवेत् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाशरूपी आँगन
धूप, बादल, धूलिपटल, अन्धकार, सूर्य, चन्द्रमा, तारावृन्द, विमानराशि, गरूड, पर्वत.सुर ओर
असुरो के क्षोभो से भी अपनी प्रकृति का (पूर्वावस्था का) त्याग नहीं करता है, कारण कि महाशय
पुरुष की स्थिति आश्चर्यमय तथा उन्नत दिखाई देती है