Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
वेल्लन्महाकमलपल्लवतालवृन्तसंवीजितं वलितचामरचारुफेनम् ।
राजायमानमलिकोकिलगीतगीतं सहृत्तपङ्कजलताललिताङ्गनौघम् ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस आकाशतल में सुर और असुरों के अनेक विमान तारों के सदृश मालूम पड़ते हैं,
जो अश्विनि आदि नक्षत्रों का निवासस्थान है, जो रात-दिन चलनेवाले महोन्नत सूर्य, चन्द्र आदि
का भी स्थान है, उस चौगिर्द भरे हुए भी आकाश में मूर्ख जनों की "शून्य" ऐसी प्रतीति आज तक
नष्ट नहीं हुई । जहाँ पर इस प्रकार का विशाल ओर शक्तिशाली आकाश अज्ञं द्वारा लगाये गये
अपवाद को मिटाने में समर्थ नहीं हुआ वहाँ दूसरा कौन पुरुष लोकापवाद को मिटाने में समर्थ
(८) योद्धा के अनुरूप का तात्पर्य यह है कि यदि योद्धा एक हो तो एक ही उससे लड़, यदि
किसी सवारी पर हो तो सवारीवाला ही, धनुषसहित हो तो धनुषयुक्त ही, खड्गयुक्त हो तो
खड्गयुक्त ही, आयुधरहित हो तो आयुधरहित ही बाहुयुद्धं करता हुआ लड़, अन्यथा नहीं
होगा ?