Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
भृङ्गाग्रभाजनमनोहरहारिगीतं राजीवरेणुरणकीर्णपिशङ्गतोयम् ।
डिण्डीरपिण्डपरिपाण्डुरपुण्डरीकखण्डोपमण्डिततटोपवनावतंसम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
मेघो के अगणित आडम्बरं से, प्रलयकाल की असंख्य अग्नियों से, पर्वतों के
क्रोधपूर्णं पंखों के आघातों से, तारों के वृन्दों से तथा देवता ओर दैत्यों के संग्रामो से आकाश आज
तक भी प्रकृतिविकृति को प्राप्त नहीं होता है । सचमुच जिनके स्थिराशयतारूप गुण हैं, उन्हीं की
महिमा का अन्त नहीं दिखाई देता