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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, Verse 63

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 117, verse 63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 63

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

दूसरा अनुचर तालाब में कॉक्-कॉँव करते हुए घूम रहे कौ के ग्रति कहता है / अरे निन्द्य कौए, अरे अपनी कर्णकटु काँव-काँव से हंस, सारस आदि के सुगुणों को मटियामेट करनेवाले, तालाब में कीचड़ में घूमता हुआ तू सुन्दर भ्रमरों की गुँजार को अपनी कर्णकट्ु काँव- काँव से जो तिरोहित करता है, इससे मेरे सिरपर शल्यकी-सी वेदना पैदा होती है